personal development मेरी सोच


ज़माना बदल रहा है या मेरी सोच

attitude towards life

 "दुनिया अब  पहले जैसी नहीं रही,ज़माना बहुत ख़राब गया है।".... 

 ऐसी बातें हमें आम सुनने को मिल ही जाते हैं, कभी सुबह की अख़बार पड़ते हुए बरांदे में बैठे दादा जी के मुँह से, तो कभी रोज़ घटने वाली घटनाओं के बारे में सुन कर आई माँ की सहेली के मुँह से और कभी-कभी तो न्यूज़-चैनल पर ख़बरें देखते हुए हम खुद भी कह  देते हैं .…पर क्या वाकई  माहौल इतना बिगड़ गया है, ज़माना  इतना  ख़राब गया है  ?

 सुबह अख़बार पढ़ते हुए एकाएक मेरी नज़र स्वामी सचिदानंद की लिखी हुई कुछ पंक्तियों पर गई जिन्हे पढ़ कर लगा मानो मेरे ही मन की गुथ्थियों का जवाब अपनी पंक्तियों में दिया हो उन्होंने :

"आपकी दुनिया आपके खुद के विचारों और मानसिक दृष्टिकोण पर आधारित है।  पुरी दुनिया आपका स्वयं का प्रेक्षपण यानि प्रोजेक्शन है। "


बात तो बिल्कुल सही हैं  दुनिया तो वही हैं सूरज आज भी वैसे ही रौशनी दे रहा है जैसे पहले देता था और ऐसा भी नहीं की पहले चाँद दिन में निकलता था अब रात को निकलने लगा है. … नहीं, चाँद पहले भी रात में ही निकलता था और सूरज दिन मेंकहने का मतलब ये है कि सब कुछ तो वैसा ही है जैसा हमेशा से था , अगर कहीं परिवर्तन आया है तो वो है हमारी सोच में , हमारे नजरिया मेंजिसने हमारे रंग-ढंग और पहनावे  के साथ-साथ ज़माने का मिज़ाज भी बदल दिया है। 

सत्य  यही है की हम सब रहते तो एक ही दुनिया में हैं पर इसको देखने का दृष्टिकोण सबका अपना-अपना है।  इसलिए हमें दुनिया कैसी लगती है इसके ज़िम्मेदार हम खुद हैं क्योंकि ये  हमारे नज़रिये पर निर्भर करता है कि हमारा किसी भी चीज़ को देखने का समझने का नज़रिया कैसा है....हमारे लिए ये  दुनिया सिर्फ अंधकार और दुखों से भरी और निराशाजनक भी हो सकती है या उम्मीदों और खुशियों से भरी भी, ये हमें दुखी और उदास कर देने वाली भी हो सकती है या हमको  उमंगों और खुशियों से भरे एक गुलिस्तान जैसी भी लग सकती हैये हमें जहन्नुम भी लग सकती है और जन्नत भीये पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हमने अपने मन और  मस्तिष्क में इसकी कैसी तस्वीर बना रखी है :

 सकरात्मक और आशावादी या नकरात्मक और निराशावादी। 


 जैसी तस्वीर हम दुनिया के प्रति अपने मन में बनाते हैं वो हमारे सोचने के ढंग , हमारी मनोदशा और हमारे अनुभवों पर निर्भर करती है और हमारी जागरूकता आंतरिक तौर पर दुनिया के प्रति हमारी धारणा का निर्माण करती है।  हम सब अपने मन में दुनिया की एक तस्वीर बना लेते हैं जोकि हो सकता है हमारी थोड़ी सी अधिक और  किसी और की थोड़ी कम असल दुनिया से मेल खाती हो, पर किसी भी परिस्थिति में  दुनिया की दोनों तस्वीरें  एक जैसी बिल्कुल भी नहीं हो सकती  …और इस सच को अपनाना हमारे लिए बेहद ज़रूरी है क्योंकि अगर हम  यही मान कर चलेंगे की दुनिया वैसी है जैसा हम सोचते हैं और इसे कभी   नहीं बदला जा  सकता.... तो हम किसी भी किस्म का बदलाव लाने में हमेशा असमर्थ ही रहेंगे   और ही हममें कभी कुछ बेहतर बना सकने  की क्षमता  होगी , तो  स्वयं  के जीवन को हम बेहतर बना सकेंगे , समाज को  और दुनिया की तो बात ही बहुत दूर की है।ख़ास कर तब जब हम  दुनिया के प्रति नकरात्मक नज़रिया रखते है.… 

अगर आप इस सच को समझ जाएं और इस बात पर यकीन कर लें कि दुनिया  प्रति आपकी धारणा ज़्यादातर आपकी खुद बनाई हुई है तो आप दुनिया को देखने का नज़रिया बदल कर अपना तजुर्बा भी बदल सकते हैं। जब  एक बार आपको एहसास हो जायेगा कि ज़रूरी नहीं की दुनिया को देखने का नज़रिया आपका शत-प्रतिशत सही ही हो तो सच को जानने और समझने की हम शुरुआत करने लगते हैं और जितना ज़्यादा हम सच के करीब जाते जायेगे उतने ही कामयाबी के शिखर पर पहुँचने के , सुखमई जीवन के और नए  अवसरों के प्रति उतने ही जागरूक भी होते जायेंगे, जोकि हम नकरात्मक मानसिकता यानि नेगिटिव माइंडसेट के चलते नहीं  देख पाते  

ये तो हुई एक बात पर एक सच और भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता ....अब  ये तो हम भली-भांति जान ही चुकें हैं कि दुनिया वैसी नहीं है जैसा हम सोचते हैं पर दुनिया वैसी भी नहीं है जैसी हमें दिखती है.… दरअसल ये हमारी सोच और हकीकत की एक मिली जुली तस्वीर है , यहाँ सच्चाई है तो झूठ भी है, अच्छाई है तो बुराई भी हैयदि सकारात्मकता  इस दुनिया का हिस्सा है तो नकारात्मकता भी है इसलिए सिर्फ सकारात्मकता की बात की जाऐ  और नकारात्मक पहलु को पूरी तरह अनदेखा कर दें ये भी बिल्कुल ठीक नहीं क्योंकि सकारात्मक सोच हमें आशावादी तो बनाती है पर नकारात्मक पक्ष को अनदेखा कर देना हमें  बेपरवाह बना सकता है और ऐसे में सामने खड़े खतरों से  परेशानियों से हम अंजान रह जाते हैं।
   
 दूसरी तरफ दुनिया के प्रति पूरी तरह से नकारात्मक हो जाना तो बिल्कुल सही हैं क्योंकि ऐसा करने से सिर्फ हम अपने लिए प्रसन्नता  के, आशाओं  के और संभावनाओं के, नये अवसरों के दरवाज़े बंद कर लेते हैं इसलिए दुनिया के प्रति अपनी सोच सकरात्मक रखनी चाहिए पर साथ ही इसके नकरात्मक पहलु को भी हमें नज़र अंदाज़ नहीं करना चाहिए, ये हिफ़ाज़त की नज़र से हम सब के लिए बहुत आवश्यक  है और याद रखिये यदि आप सही हैं तो ज़रूरी नहीं की आपके आस-पास के लोगों की मंशा भी सही ही हो क्योंकि कई दफ़ा सही होते हुए भी हमें किसी और की विकृत मानसिकता की सज़ा भुगतनी पड़ती है।  

 हर सिक्के के दो पहलु होते हैं वो अलग बात है कि एक बार में सिर्फ एक ही नज़र आता है पर इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं की दूसरा पहलु है ही नहीं इसलिए अपने आस-पास के वातावरण और  अपने जीवन को खुशनुमा बनाने के लिए जहाँ सकारात्मकता और आशावादी स्वभाव की ज़रूरत है तो वहीं दूसरी ओर, अपने आप की, अपने सगे-सम्बन्धियों की, समाज की रक्षा और उनमें  बदलाव की दृष्टि से नकारात्मकता और विकृत मानसिकता से बचाव और सुधार  की भी बहुत  ज़रूरत  हैक्योंकि ज़माना बदल रहा है और हमारी सोच भी।















































 


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