3 ग़लतियां . . . .कभी न करे कोई 3 mistakes of life

3 ग़लतियां . . . .कभी न करे कोई

‘गलती’ करना हम सबका अधिकार है और गलतियों से सीखना हमारी ज़िम्मेदारी …. लेकिन मानते हम सिर्फ इसका आधा ही हैं, गलती करने को हम अपना अधिकार तो मानते हैं पर सीखने वाली बात भूल जाते है।

कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जिन्हें सुधारा जा सकता है और उनकी माफ़ी मिल जाती है, लेकिन कुछ गलतियां ऐसी भी है जिन्हें न तो सुधारा जा सकता है और न ही जिनकी माफ़ी मिलती है इसलिए हमेशा ख्याल रखना चाहिए की ग़लती सिर्फ़ ग़लती हो और सुधार और माफ़ी के काबिल हो।
वैसे तो ऐसी कई चीज़ें है जो हमें नहीं करनी चाहिए लेकिन यहाँ हम उन 3 गलतियों की बात करेंगे जो किसी को भूल कर भी नहीं करनी चाहिए …क्योंकि कुछ गलतियां ऐसी भी होती हैं जिनकी माफ़ी तो मिल जाती है पर कोई भूल नहीं पाता और पछतावा उम्र भर के लिए रह जाता है।

1. क्रोध में कभी जवाब न दो

“Listen half,understand quarter and speak double ”  (“लिसेन हॉफ, अंडरस्टैंड क्वाटर एंड स्पीक डबल.”) क्रोध में इंसान यही करता है …आधा सुनता है, उसका भी आधा समझता है और दौगुना बोलता है। क्रोध एक ऐसा विकार है जिसमें इंसान अपनी सुध-बुध खो देता है, न तो इंसान का स्वयं पर कोई काबु रहता है और न ही अपनी जुबान पर। पुराने ज़माने की एक कहावत है;
“कमान से निकला हुआ तीर और ज़ुबान से निकले हुए शब्द कभी वापस नहीं आते।”

इस कहावत में कितनी सच्चाई है हम सब जानते हैं पर मेरा तजुर्बा यही कहता है कि तलवार का वार इंसान भूल जाता है पर लफ़्ज़ों के तीर कोई नहीं भूल पाता और अपने क्रोध वश होकर हम ऐसे वचन बोल देते हैं जिनका एहसास हमें उस समय तो नहीं होता लेकिन जब एहसास होता है तो चाहे ज़िन्दगी भर उसकी भरपाई करते रहें पर कर नहीं पाते इसलिए हर धर्म में क्रोध को एक विकार कहा गया है और इस पर काबु पाना बेहद ज़रूरी माना जाता है। इसलिए अपने क्रोध को कभी स्वयं पर हावी न होने दें और क्रोध में कभी किसी को जवाब न दें क्योंकि क्रोध में कही गई बात यकीनन कड़वी और तकलीफ़देह होती है।

2. बहुत ख़ुश हो तब कभी कोई वादा न करो

ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी में कौन नहीं चाहता, आप, मैं, हम सब अपने जीवन में ख़ुश रहना चाहते हैं पर कभी-कभी अत्यंत ख़ुशी की स्थिति में भी हमारी सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाती है क्योंकि उस समय हमारी बुद्धि, हमारे मन पर अत्यंत ख़ुशी का प्रभाव होता है, ऐसे में हम अपनी सीमाओं, अपनी वर्तमान स्थिति तक को भी भूल जाते हैं और ऐसे में कही गई बातें, वादें हम सोच समझ कर नहीं करते….अपने हालात, अपनी सीमाओं और व्यवहारिक तौर पर उन चीज़ों पर अमल करना किस हद तक मुमकिन है हम ये सब नहीं सोचते लेकिन जब हम उस स्थिति से बाहर आते है तब हमें अपनी कही हुई बातों और उनकी व्यवहारिकता में फ़र्क समझ आता है और अक्सर जाने-अंजाने ऐसी स्थिति में हम कई ऐसे वादे भी कर जाते हैं जो हमारे लिए दुख का कारण बन जाते हैं.… इसलिए याद रखिये जब हद से ज्यादा खुश हो तब उत्तेजना में आकर कभी वादा मत करना।

3. दुखी मन हो तो कोई फ़ैसला मत करना

दुख की स्थिति में अक्सर व्यक्ति का अपने विचारों पर काबु नहीं रहता, उसके न चाहते हुए भी नकरात्मकता, निराशा उसे घेर लेती है और वो निराशावादी बन जाता है। व्यक्ति के मन पर दुख का इतना गहरा प्रभाव होता है कि वो ये मानने को तैयार ही नहीं होता कि कोई भी स्थिति सदा के लिए नहीं रहती, वक़्त के साथ हालात बदलते हैं, विचार बदलते हैं और अक्सर व्यक्ति ऐसी स्थिति में सब्र नहीं रखता और ऐसे फ़ैसले ले बैठता है जो स्थितियां बदलने पर हमारे लिए परेशानी की वजह बन जाते है इसलिए दुख की घड़ी में सब्र रखें और दुखी मन और नकरात्मक सोच से कोई फ़ैसला न लें।
अंत में सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि अत्यंत क्रोध, अत्यंत ख़ुशी या अत्यंत दुख हो, हमेशा स्थितियों के सामान्य होने का इंतज़ार करें क्योंकि सामान्य स्थिति में उठाया गया हर कदम सोच-समझ कर और उसके अच्छे -बुरे परिणामों पर विचार करके उठाया गया होता है जो की हमेशा सही होते हैं…. असामान्य स्थिति में या भावनाओं के वेग में बह कर लिए गए फ़ैसलों को सामान्य स्थिति में हम सम्भाल नहीं पाते। इसलिए याद रखिये हालात कैसे भी हों हमेशा एक से नहीं रहते।

 

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