कलर थेरेपी कैसे काम करती है?

कलर थेरेपी वैकल्पिक चिकित्सा का एक रूप है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा को स्वस्थ करने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। रंगों द्वारा स्वास्थ्य विकारों की वजह से हमारे भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक स्तर पर हुए ऊर्जा असंतुलन को बहाल करने काम किया जाता है। हम रोजाना विभिन्न प्रकार के बहुत सारे रंग देखते हैं। प्रत्येक रंग हमारे मन पर अलग ढंग का प्रभाव डालता है, जैसे- खुशी, उदासी , अवसाद , गर्मी , शांति , क्रोध और जुनून आदि।

पल-भर ठहरकर सोचिए और बताइये कि पृथ्वी पर जीवन के सभी रूपों के लिए ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत क्या है? जी हां – यह सूर्य का प्रकाश है, जो कि अलग-अलग तरंग-दैर्ध्यों से निर्मित है। सूर्य के प्रकाश का हम पर चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है, खासकर सर्दियों के दौरान हम देख सकते हैं कि धूप में हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका पर कितना अच्छा प्रभाव पड़ता है। दृश्य प्रकाश के पूरे स्पेक्ट्रम में लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, आसमानी और बैंगनी यानी सात प्रकार के रंगों का अलग-अलग तरंग दैर्ध्य होता है। हरेक रंग की अपनी अलग कंपन-आवृत्ति है और यह हमारे शरीर के अलग-अलग अंगों के साथ विशेष ढंग से जुड़ा होने के कारण उन सब पर विभिन्न संयोजनों में मिलकर विशेष प्रकार से प्रभाव भी डालता है।

आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर के चारों ओर एक प्रकार का प्रभामंडल होता है, जो वास्तव में शरीर के अंदर होने वाली जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप बनाया गया एक चुंबकीय क्षेत्र है। रंगों में एक प्रकार की कंपन ऊर्जा पाई जाती है, जो स्वास्थ्य संबंधी विकारों के विभिन्न प्रकार के इलाज हेतु इस चुंबकीय क्षेत्र के साथ अंतक्रिया करती है। यह कंपन ऊर्ज़ा भीतर के ऊर्जा-संचलन को बहाल करने के लिए जैव रासायनिक प्रतिक्रियाएँ करती है।
कलर थेरेपी आजकल भावनात्मक और शारीरिक रोगों के उपचार तथा मानसिक रोगियों को विशेष रूप से ठीक करने के लिए इलाज का एक लोकप्रिय विकल्प बनता जा रहा है।

अपने विशिष्ट गुणों की वजह से प्रत्येक रंग का हमारे शरीर में अलग शारीरिक असर पड़ता है , उदाहरण के लिए, हरे रंग में एक संतुलनकारी प्रभाव पाया जाता है, इसलिए जब इसे थाइमस ग्रंथि पर टारगेट किया जाता है तो यह टी-सेल उत्पादन को विनियमित करने में मदद करता है पर जब इसे ट्यूमरों पर टारगेट करते हैं तो इसका प्रतिकूल प्रभाव लक्षित होता है।

नारंगी रंग से जहाँ पेशियों में सूजन बढ़ जाती है, जबकि बैंगनी से मांसपेशियों के दर्द में आराम मिलता है। जाहिर है, रंगों के विभिन्न प्रकार के संयोजनों का भी रोगों के इलाज में उपयोग किया जाता है, उदाहरण के लिए हरे, नीले और नारंगी का संयोजन गठिया के इलाज हेतु प्रयोग किया जाता है, हरे और पीले रंग का संयोजन मधुमेह के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है, बैंगनी और नीले रंग का संयोजन माइग्रेन के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है, लाल, नीला और हरा महिलाओं में बांझपन के लिए उपयोगी है तथा आसमानी और हरा कैंसर के इलाज के लिए है।

इस प्रकार आप देख सकते हैं कि हमारे ऊपर रंगों का विशिष्ट प्रभाव किस तरह काम करता है? वस्तुत: प्रत्येक व्यक्ति रंगों के प्रति अलग तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करता है। रोग कुछ और नहीं, सिर्फ़ हमारे शरीर में कहीं पैदा हो चुकी अस्थायी रुकावट या जीवनी-शक्ति की अव्यवस्था है। रंग मानव शरीर में जैव रासायनिक और हार्मोनल प्रक्रियाओं को सक्रिय करने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करते हैं, जिससे हमारा स्वास्थ्य पुन: अपनी उत्तम कार्यावस्था में आने लगता है। बीमारी की हालत में जब हमारे शरीर की कोशिकाएँ कमजोर हो जाती हैं तो एक अनुभवी रंग-चिकित्सक द्वारा रंगों का इस तरह प्रयोग किया जाता है कि मद्धिम ढंग से काम कर रही कोशिकाओं को ऊर्जा की एक अतिरिक्त खुराक मिलती है। रंग चिकित्सा कला और विज्ञान दोनों एक साथ है। एक रंग-चिकित्सक को इस बात की गहरी जानकारी होनी चाहिए कि किस बीमारी में किस रंग का कब, कितना और कितनी देर तक इस्तेमाल किया जाना चाहिए जिससे इलाज का वांछित असर प्राप्त हो। अन्यथा इसका दुरुपयोग होने पर प्रतिकूल परिणाम भी मिल सकते हैं।

इसलिए अपने रंग-चिकित्सक के चयन से पूर्व उसकी योग्यता, पूर्व-अनुभव और प्रतिष्ठा आदि की पूरी सावधानी से जाँच-परखकर कर लेवें।

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