सौहार्द


झब्बूमल जी को स्वर्ग और नरक, दोनों में घूमने का अवसर दिया गया। पहले झब्बूमल जी नरक में गए। नरक में उपस्थित सभी लोग एक दावत की मेज़ पर बैठे थे। मेज़ तरह-तरह के पकवानों से सजी हुई थी। लेकिन फिर भी किसी के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उल्लास और खुशी की बजाय सुस्त और उदास बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे।
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झब्बूमल जी ने ध्यान से देखा तो पाया कि प्रत्येक व्यक्ति की बांई बाजू के साथ खाना खाने का काँटा और दायीं बाजू पर खाना खाने की छुरी बंधी थी। प्रत्येक में चार पायों वाला हैंडल था, जिसके कारण खाना खाना असम्भव हो गया था। इसलिए सभी प्रकार के व्यंजन मौजूद होने के बावजूद, सभी भूखे थे।
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दूसरा पडा़व स्वर्ग का था। वहाँ भी बिल्कुल ऐसा ही दृश्य था। वही खाना, वही हैंडल, वही छुरी, वही काँटें! लेकिन  स्वर्ग के लोग बहुत खुश थे और हँस रहे थे। यह देख  झब्बूमल जी सोचने लगे कि समान परिस्थितियों के बाद भी दोनों जगह के माहौल में इतना अन्तर कैसे! तभी उन्हें अपने सवाल का जवाब भी मिल गया। नरक में प्रत्येक व्यक्ति खाना खाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन छुरी-काँटे हाथ में बन्धे होने के कारण यह असम्भव था।
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स्वर्ग में प्रत्येक व्यक्ति सामने वाले को खाना खिला रहा था । आपसी सौहार्द से उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी खुशियाँ तलाश ली थी।
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