बदलाव

झब्बूमल जी युवावस्था में क्रांति की बातें किया करते थे। वे हमेशा यही कहा करते थे कि उन्हें व्यवस्था को बदलना है। समाज में फैली बुराइयों और कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकना है, आदि।

जब वे बूढे हुए तो किसी ने उनसे पूछा-“बाबा! आपने अपने जीवन से क्या सीखा?” उन्होंने जवाब दिया- “जब मैं युवा था तो ईश्वर से प्रार्थना किया करता था, कि हे ईश्वर! मुझे शक्ति दो ताकि मैं इस दुनिया को बदल सकूँ। जब मैं अधेड़ अवस्था में पँहुचा  और मेरी आधी जि़दंगी गुजर गई, तो मैंने पाया कि मैं अब तक एक भी आदमी को नही बदल पाया हुँ। यह देखकर मैंने अपनी प्रार्थना को बदल दिया।

अब मैं ईश्वर से मांगता था- हे ईश्वर! मुझे उन लोगों को बदलने की शक्ति दो जो मेरे सम्पर्क में आते हैं। अब जब मैं बूढा़ हो गया हूँ और मेरी मृत्यु निकट है, तो मुझे समझ आता है कि मैं कितना मूर्ख हूँ , जो दूसरों को बदलने  के प्रयास मे जीवन व्यर्थ कर दिया। अब मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि हे ईश्वर! मुझे इतनी शक्ति दो कि मै स्वयं को बदलने में क़ामयाब हो सकूँ।”

परिवर्तन का प्रारंभ स्वयं से होता है, दुसरों से नही!

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