भटकाव

जॉन जोन्स न्यूयॉर्क में था । उसे बोस्टन जाना था, इसलिए वह एयरपोर्ट गया और उसने टिकट ख़रीदा। उसकी उडा़न में अभी कुछ समय था, इसलिए वह वहाँ वज़न तोलने की मशीन के पास चला गया। उसने मशीन पर चढ़कर एक सिक्का डाला तो मशीन में से एक पर्ची निकली, जिस पर लिखा था-“आपका नाम जॉन जोन्स है। आपका वज़न 180 पौंड़ है और आप बोस्टन के लिए जाने वाली अगली उडान पकडने वाले हैं। आपकी उडा़न का समय है दो बजकर बीस मिनट।”
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जॉन आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि सारी सूचना सही थी। उसे लगा इसमें ज़रूर कोई तिकड़म है। वह दोबारा मशीन पर चढा़ और सिक्का डाला। अबकी बार जो पर्ची निकली पर लिखा था-“आपका नाम अभी भी जॉन जोन्स है। आपका वज़न अभी भी 180 पौंड है और आप अभी भी बोस्टन के लिए दो बजकर बीस मिनट वाली उडा़न पकडने वाले हैं।यह पढ़कर जॉन पहले से भी अधिक परेशान हो गया। उसे विश्वास हो गया कि इसमें अवश्य कोई चाल है। वह प्रसाधन कक्ष में गया अपने कपडे़ बदल डाले। वापस आकर वह दोबारा मशीन पर चढ़ा और सिक्का डाला। हर बार की तरह इस बार भी पर्ची निकली। लेकिन इस बार उस पर्ची पर लिखा था-“आपका नाम अभी भी जॉन जोन्स है, आपका वज़न अभी भी 180 पौंड है, लेकिन आपकी  बोस्टन वाली उडान अभी-अभी छूट गई है।”
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हम अनावश्यक बातों में उलझकर अपनी मंजिल को भूल जाते हैं। यही भटकाव असफलता का मूल कारण है।
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